कभी नक्सलियों की ढाल, अब CRPF के दोस्त

रायपुर
बीहड़ जंगलों और कठिन हालात में तैनात सीआरपीएफ जवानों के लिए इन दिनों काम करने का फलसफा है- ‘सबकी सोचने का जो हुनर आया है मुझे, यह सलीका मेरी वर्दी ने सिखाया है मुझे।’ नक्सल प्रभावित इलाकों से लेकर कश्मीर में आतंकियों के गढ़ तक, जवान अपनी ड्यूटी से आगे निकलकर स्थानीय लोगों के लिए फरिश्ते बन रहे हैं। इस कारण जो गांव वाले अब तक सुरक्षाकर्मियों को संदेह की नजर से देखते थे, अब वही इन जवानों को अपना समझने लगे हैं।

सीआरपीएफ के डीआईजी दिनाकरन ने एनबीटी से कहा कि स्थानीय लोगों का दिल जीतने से उन्हें बहुत मदद मिल रही है। उन्‍होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सीआरपीएफ की कोबरा बटैलियन है। बहुत ही सुदूर बस्ती में एक गांव बुडगीचेरु से सीआरपीएफ दस्ता गुजर रहा था। वहां देखा कि एक घर के सामने लोग रो रहे हैं। वहां एक व्यक्ति ट्रैक्टर से गिर गया था। सिर से बुरी तरह खून बह रहा था। इलाज का कोई साधन नहीं था।

उन्‍होंने बताया कि जवानों ने उसे खाट पर लिटाकर सात किलोमीटर दूर अस्पताल दौड़ते हुए पहुंचाया और वक्त पर पहुंचने से उसकी जान बची। बाद में गांव वालों ने जवानों को बुलाकर आभार जताया। इसी इलाके में नक्सली कई बार आईईडी से जवानों पर हमला कर चुके हैं। लेकिन इस मदद के बाद गांव वाले उनके समर्थन में आए।

एक हफ्ते के इलाज के बाद कोमा से बाहर आई बच्ची
बस्तर के सबसे नक्सल प्रभावित इलाके के एक गांव में एक दिन जब सीआरपीएफ की टोली गई तो देखा कि एक 6 महीने की बच्ची मलेरिया से बुरी तरह ग्रसित थी। महीने भर से बीमार इस बच्ची का कोई इलाज नहीं हो रहा था। गांव में झाड़-फूंक से हालत और खराब हो गई थी। नक्सलियों की ऐसी दहशत थी कि जवानों से बात करना भी गुनाह माना जाता था लेकिन मां की बेबेसी ने डर से आगे जाकर सीआरपीएफ से मदद मांगी।

परिवार को बच्ची के साथ कैंप लाया गया। एक हफ्ते के इलाज के बाद वह कोमा से बाहर आई। अब बच्ची दुरुस्त है। जिन जवानों को गलत तरीके से देखा जाता था अब उन्हें इस इलाके में उम्मीद से देखा जाता है।

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