इस बॉर्डर की हथियारों से नहीं दिलेरी से हिफाजत

नई दिल्लीभारत-बांग्लादेश सीमा अमूमन शांति वाला इलाका है। यह इलाका दो दोस्त देशों की सीमा को जोड़ती है। हालांकि, दोनों देशों की सीमा पर जो हालात और चुनौतियां हैं, उसे देखते हुए बीएसएफ के लिए यह बहुत कठिन मोर्चा है। सीमा से जुड़ी तमाम तरह की चुनौतियां यहां भी है। उनसे निपटने के लिए बीएसएएफ को कई मोर्चों पर न सिर्फ मजबूत इरादों से होकर गुजरना पड़ता है बल्कि कई बार अंतर्द्वंद्व का भी सामना करना पड़ता है।

दोनों देशों की शांति के बीच तस्करी और घुसपैठ के हालात ऐसे हैं कि वॉर जोन न होने के बावजूद सुरक्षा बलों को हमेशा ऐक्शन मोड में रहना पड़ता है। दोनों देशों ने 2011 में सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए नॉन-लीथल पॉलिसी अपनाने का समझौता किया था। उससे पहले सीमा पर बहुत हिंसक टकराव हुआ करते थे। उसके बाद सीमा पर शांति तो आई लेकिन बीएसएफ के लिए अब बहुत ही कठिन दौर शुरू हो गया है।

क्या है Non-Lethal पॉलिसी
इस नीति के तहत टकराव होने की स्थिति में गैर-जानलेवा हथियारों से सामने वाले का मुकाबला किया जाता है। गैर-जानलेवा हथियारों की श्रेणी में उन हथियारों को रखा जाता है जिनसे जान जाने की आशंका बेहद कम होती है। ये हथियार मुख्यतः घायल करने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं। बॉर्डर पर इस समय जो नॉन-लीथल हथियार प्रयोग में हैं वे हैं- टियर स्मोक, रबर पैलेट, चिली पाउडर आदि।

हद की सीमा तक संयम रखने की चुनौती
नॉन-लीथल पॉलिसी की अपनी चुनौती भी है। बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि जब तस्कर और अपराधियों ने समझ लिया कि उनपर जानलेवा प्रहार नहीं होगा तो उनके मन से डर भी निकलने लगा है। कई मौकों पर वे सामने आकर आक्रमण कर देते हैं। इसी कारण पिछले एक साल के अंदर एक दर्जन से अधिक बीएसएफ जवान गंभीर रूप से घायल हो गए। कई मौकों पर संयम बनाए रखना बहुत ही कठिन हो जाता है।

बीएसएफ के आईजी अजमल सिंह ने कहा कि जब तक आपात स्थिति न बन जाए तब तक जवान घातक जवाब नहीं देते हैं। बात इतनी भर नहीं है। बीएसएफ के संयम रखने के बाद भी बांग्लादेश आरोप लगाने से पीछे नहीं हटता। बांग्लादेश के सुरक्षा बल ने आरोप लगाया कि बीएसएफ जवान उनके नागरिकों को मार रहे हैं। हालांकि बीएसफ इस आरोप का पूरे तथ्यों के साथ इनकार करता है। वह इस दोहरी चुनौती को झेलने में आ रही दिक्कतों को भी स्वीकार करता है। एनबीटी संवाददाता ने जब इन इलाकों का दौरा किया तो देखा कि किस तरह खुली सीमा और बाढ़ के पानी का लाभ उठाकर तस्कर इधर से उधर चले जाते हैं।

सीमापार मदद के लिए भी तैयार
भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ को सिर्फ अपनी ही सीमा के अंदर लोगों को महफूज रखने की चिंता नहीं है बल्कि वह सीमापार भी कई जानें बचाने में मदद करते हैं। एनबीटी जब इन जवानों के साथ था तभी बांग्लादेश सीमा के अंदर से खबर आई कि उनके दो जवान ट्रक से कुचलकर बुरी तरह घायल हो गए हैं। उनकी सीमा की तरफ बेहतर इलाज का अस्पताल नहीं है। तभी इधर से बीएसएफ के अधिकारियों ने वहां के सुरक्षा अधिकारियों से संपर्क कर उन्हें मदद देने की बात कही। इसी दौरान सिलिगुड़ी-गंगटोक रास्ते पर एक टूरिस्ट गाड़ी खाई में गिर गई। प्रशासन उसका पता लगाने में विफल रहा तो बीएसएफ से मदद मांगी। तुरंत उनकी टीम सर्च ऑपरेशन के लिए चली गई।

यह भी सही है कि जवानों को सीमा के दोनों तरफ से दुआ भी मिलती है। बांग्लादेश में सीमा से सटे सोना मस्जिद इलाके में दुकान चलाने वाले मो. अशरफ ने एनबीटी से कहा कि बीएसएफ के जवानों को वह उतनी ही इज्जत देते हैं जितनी अपने जवानों को। उन्होंने कई मिसाल देकर कहा कि जब भी जरूरत पड़ी है, उन्हें सीमापार से भी मदद मिली। अभी ही जब उनके देश का इलाका बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है, बीएसएफ के जवान कई मौकों पर उनके साथ खड़े दिखते हैं।

क्राइम फ्री जोन भी बनाया
बीएसएफ ने बांग्लादेशी सुरक्षा एजेंसी के सहयोग से पूरी सीमा को क्राइम फ्री जोन बनाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। इसके बेहतर नतीजे भी मिले हैं। सीमा पर देश का पहला क्राइम फ्री जोन इसी साल कोलकता के पास नॉर्थ 24 परगना में बन चुका है। एक समय यहां सबसे अधिक क्राइम होता था, लेकिन एक साल तक चले गहन ऑपरेशन के साथ इसे क्राइम फ्री जोन बनाने में सफलता मिल ही गई। क्राइम फ्री जोन तब माना जाता है जब एक महीने तक एक भी अपराध रिकॉर्ड नहीं हो।

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